“मेरी मृत्यु” (अध्याय-1)

मुझे पता है, आपलोग अनवरत मेरी जीवन-शैली में तनाव एवं बाधाएँ खड़ी करना चाहते हैं. मेरी अपनी तरह की शिक्षा, सर्वोत्मुखी अभ्यास एवं उत्साहवर्धक उद्यम, मेरी निजता-नैसर्गिकता तथा कोमल पर चातुर्यपूर्णता से युक्त कठिन तथा सजह श्रमशीलता के मार्ग में रुकावट डालना चाहते हैं.पर आपलोग सावधान हो जाइये कि यह वह कुमार पार्थ नहीं रह गया है. प्रचंड तूफ़ान तथा भयंकर बाढ़ के समान मेरे भीतर वैचारिक क्रांति का आगमन हो चुका है. मेरे पावं नई दिशा को बढ़ चले हैं.

सूर्य के प्रथम किरण के शुभागमन की धमक मुझे सुनाई पड़ने लगी है। मुझे जीवन के समग्रता, ऐश्वर्यता तथा भव्यता के बीच वास कर रहे आनन्द का न्यौता मिल चुका है। और मेरे पाँव उस निमंत्रणको स्वीकार कर चल पड़े हैं। अपने पाँवो में छिपे पुलक तथा थिरक को मैंने पहचान लिया है।

मेरी कुशलता वायु की तरह बहना शुरु कर दिया है। मैं सांसारिक अज्ञानता तथा सुषुप्ति से जाग उठा हूँ। नवचेतना का नवकमल कुम्हलाने लगा है। प्रेम का नव-अंकुर फूट पड़ा है। इस अनंत तथा विस्तारपूर्ण प्रकृति के अंतस्तल में छिपी अज्ञात लोगों-शक्ति ने मेरे दिल के दरवाजे पर अपनी दस्तक दे दी है। मेरे तारों को झनझना दिया है। उसके मौन-निमंत्रण को अपने प्राणों की गहराई से मैंने श्रवन कर लिया है। जीवन के महारास, महासंगीत, परम-विज्ञान की समझ मुझे आ चुकी है।

आप अदने से लोग क्या लेकर पास आए हैं। मुझे परेशान नहीं किया जा सकता है। आपकी चेष्टा व्यर्थ है। वैसे आपने सदियों-सदियों यह भूल की है। जब भी संसार में कुमार पार्थ पैदा हुए हैं तब-तब आपलोगों ने बाधा डालने का प्रयास किया है। वो भी मात्र अपने भीतर व्याप्त राक्षसी-वृति की तुष्टि के हित में। सिर्फ और सिर्फ अपने भीतर स्थित अशुभकारक-वृति कर मनोरंजन के लिए। आप सभी अपने आदत से मजबूर हैं। आप बिना सोचे-समझे अपने क्षणमय-स्वार्थप्रेरित भावों के वश हो नित्य ही क्षण-प्रतिक्षण कुजाल रचते रहते हैं. पर आप सचेत हो जाएँ कि एक नए कुमार पार्थ का अवतरण हो चुका है. एक नया मनुष्य पैदा हो चुका है. अब आपकी सारी प्रतिरोधक चेष्टाएँ व्यर्थ की होंगी। (क्रमशः...)

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